Wednesday, January 27, 2010

समधी-समधन की जय हो

सु बह-सुबह पंडितजी चाय की थड़ी पर मिले। हमें देख बोले, चाय पीने की इच्छा है क्या? हम बोले, ऐसी सर्दी में चाय पीने को कौन मना करेगा? चाय पीते-पीते पंडितजी अचानक बोले, सच बोलने से फायदा होता है या नुकसान। एकदम अप्रत्याशित सवाल से हम झेंप गए। समझ में नहीं आया कि ऐसा सवाल क्यों पूछा ? माथे पर जोर दिया, बोले सच बोलने से भला क्या नुकसान होगा। वे एकदम जोर-जोर से हंसे, अरे महानुभाव सच बोलने से भी भला कभी फायदा हुआ है। सच बोल मत देना नहीं तो कहीं के नहीं रहोगे। देखो, उस सुश्री महिला नेता को। सच बोलने के चक्कर में पार्टी से दूध से मक्खी की तरह बाहर कर दिया है। हमने पूछा, पर उसने सच बोला ही क्यों? उसे तो टिकट चाहिए भी नहीं था।

पंडितजी बोले, असल में क्या हैं कि 'एक दलÓ में टिकट बांटने वाले एक नेता को अपने समधी-समधन पर प्यार उमड़ गया। समधी-समधन ठहरे दूसरी पार्टी वाले। इन्हें चुनाव में जिताना था। इस चक्कर में ऐसे लोगों को ही टिकट दिया जो चुनाव लडऩे से पहले ही समधी-समधन का मैदान छोड़ जाएं। यह महिला नेता को नहीं जमी, और उसने उड़ता तीर पकड़कर आलाकमान से शिकायत कर डाली। महिला नेता ने बस यही सच बोल दिया और ठाली-बैठे नुकसान उठा लिया।

हम बोले, पंडितजी आप भी बिल्कुल भोले हो। अब भला ऐसा कौन मूर्ख होगा जो समधी-समधन का ख्याल नहीं रखेगा। पार्टी का तो क्या है, एकाध प्रत्याशी हार भी जाएगा तो क्या फर्क पड़ेगा। अगर समधी-समधन नाराज हो गए तो पार्टी खाक काम आएगी। आखिर बेटी की ससुराल का मामला है। पंडितजी बोले, अरे कैसी बात करते हो। पार्टी का अपना महत्व है। पार्टी के लिए तो सब मरते हैं। अब भला समधी-समधन के लिए पार्टी की बलि चढ़ती है?

हम बोले, पंडितजी आपका भेजा क्या घास चरने गया है। जो ऐसी ऊल-जलूल बातें कर रहो हो। टिकट बांटने वाले ने समधी-समधन को जिताने के चक्कर में उसके नौकरों को अपनी पार्टी से टिकट दे दिया। नाम वापसी का समय आया तो उन्होंने समधी-समधन के सामने चुनाव लडऩे से मना कर दिया और मैदान छोड़ भागे। अब आराम से बिना लड़े ही समधी-समधन निर्विरोध जीत गए। अब नया फंडा राजनीति में इजाद हुआ है। इसके लिए तो उन्हें साधुवाद दिया जाना चाहिए। आखिर ऐसे नए-नए प्रयोग राजनीति में भी होने लगे हैं। वो तो महिला नेता ही नासमझ है जो समधी-समधन की जीत से जल रही हैं।

पंडितजी नाराज होकर बोले, तुम भी खामखां टिकट बांटने वाले की तारीफ के पुल बांध रहे हो। आलाकमान ने तो महिला नेता की ऐसी-तैसी कर डाली। लेकिन टिकट बांटने वालों को छोड़ दिया। उससे एक बार भी नहीं पूछा, भैय्या तुमने ऐसे लोगों को टिकट क्यों दिया जो 'गधे के सिर से सींग की तरहÓ गायब हो गए। टिकट देने से पहले थोड़ा बहुत तो पार्टी का ख्याल रखना चाहिए था।

अब हमसे रहा नहीं गया, बोले पंडितजी! अब आप सुनना ही चाहते हो तो सुनो। सोच-समझकर तो जब टिकट देते, जब कोई लेने वाला होता। सुमेरपुर में उसको टिकट दे दिया जिसने टिकट मांगा ही नहीं। एक उस महिला को टिकट दे दिया जिसे अपनी उम्र का ही भान नहीं। एक प्रत्याशी अधिक बच्चों के चक्कर में मैदान छोड़ गया। दो-तीन प्रत्याशी ऐसे निकले जिन्होंने नाम वापस ले लिया। अब भला समधी-समधन के सामने वाले प्रत्याशी ने नाम वापस ले लिया तो इतना हल्ला क्यों? समधी-समधन की जय बोलो और चाय के पैसे देकर अपने घर जाओ। राजनीति में नए प्रयोग के लिए धन्यवाद दो। - वोटर

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