नरेगा की मजदूर, खेल में सितारा
राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी घर चलाने के लिए कभी 'नरेगा' में मजदूरी करती है तो कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है
राजेश दीक्षित
जोश, जुनून और जज्बा कुछ भी हासिल करने के लिए काफी है। पाली जिले की रायपुर तहसील के रामपुर गांव में रहने वाली दरियाव कुमारी ने यह साबित कर दिया है। ग्रामीण परिवेश में रहते हुए उसने वॉलीबाल में राष्ट्रीय स्तर तक अपनी प्रतिभा दिखाई। मां-बाप की इस इकलौती संतान ने साबित कर दिया कि बेटी किसी से कम नहीं। परिवार की आर्थिक हालत कमजोर होने के बावजूद उसने हार नहीं मानी और खेल की दुनिया में मुकाम हासिल किया। वॉलीबाल में राष्ट्रीय स्तर पर सात बार हिस्सा लिया और एक बार गोल्ड मेडल हासिल किया। एक बार राजस्थान टीम की बागडोर भी संभाली। चार साल पहले उसके सिर से पिता का साया उठ गया। इसके बावजूद उसने हौसले को मजबूत रखा। खेल क्षेत्र में उपलब्धिओं को लेकर जिला प्रशासन ने उसे एक बार सम्मानित किया। दरियाव अब स्वयंपाठी के रूप में बीए कर रही है। घर का खर्च चलाने के लिए वह 'नरेगा' में मजदूरी कर अपने खेल के हुनर को बनाए हुए है।
नहीं टूटने दिया हौसला
दरियाव ने छोटी उम्र में काफी परेशानियां उठाईं, लेकिन हौसलों के आगे मुसीबतें हार गई और उसे मंजिल पाने में कामयाबी मिली। दरियाव उन पलों को याद कर सिहर उठती है, जब उसने खेल की दुनिया में कदम रखा था। दलित परिवार में जन्म और लड़की होने का भी दंश झोला। दरियाव बताती है कि सातवीं कक्षा से खेल की शुरुआत की। इसी दौरान पिता को लकवा मार गया। हालात से मजबूर होकर पढ़ाई छोड़ दी। खर्चा चलाने के लिए मजदूरी शुरू कर दी। इसी बीच स्कूल के शारीरिक शिक्षक चम्पालाल भाटी भगवान बनकर आए। उनके सहयोग से दुबारा स्कूल जाने लगी। आठवीं कक्षा में पढ़ते समय पावटा में
आयोजित राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ।

