Tuesday, February 2, 2010

कालम--- चुनावी चकल्लस/ इधर-उधर की

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चुनावी चकल्लस- 24 जनवरी-2009

खाली पीली पंचायती

'पाली री पंचायतीÓ बहुत सुनी। क्या कभी आपने 'खाली-पीली पंचायतीÓ सुनी है? चलो, कोई बात नहीं हम सुना दें। 'खाली-पीली पंचायतीÓ का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें गांठ से कुछ जाता नहीं है, लेकिन अच्छी खासी पब्लिसिटी जरूर होती है।

इन दिनों पंचायत चुनावों की 'पंचायतीÓ चल रही है। पिछले दिनों टिकटों की 'पंचायतीÓ देखी। एक पार्टी के 'मुखियाजीÓ की टिकट वितरणों में 'पंचायतीÓ चल नहीं पाई। उन्होंने राजनीतिक पैंतरा चलाया। चहुंओर हल्ला मचाया। दिल्ली जाऊंगा, आलाकमान से मिलूंगा और इस्तीफा सौंपूंगा। आलाकमान से समय मांगा है, मुलाकात होते ही त्यागपत्र दे दूंगा। लेकिन यह क्या...। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन और अब तक चौदह दिन निकल गए। लेकिन मुखियाजी की त्यागपत्र की सुगबुगाहट नजर नहीं आई। हमें लगा कि कहीं वे भूल तो नहीं गए। छानबीन की। पता चला कि दिल्ली से उन्हें मिलने के लिए समय नहीं दिया है।

खाली-पीली पंचायती का एक किस्सा और सुनो। पाली शहर के एक 'नेताजीÓ ने नगर परिषद चुनाव से पहले 'खाकी के जिला मुखियाÓ को हटाने का एलान कर डाला। एलान भी ऐसा कि 'खाकी के जिला मुखियाÓ नहीं हटे तो कलक्ट्री के सामने ही आत्मदाह कर लूंगा। इसके लिए उन्होंने एक निश्चित समय भी दिया। 'खाकी के जिला मुखियाÓ को हटाने के लिए उन्होंने जयपुर तक पंचायती कर डाली, सरकार के सुप्रीमो से भी मिल लिए। इतनी सारी माथा-पच्ची के बाद भी हुआ क्या..., अब यह आपको बताने की जरुरत नहीं है। खैर...। नेताओं की बातें पकड़ी नहीं जाती।

-वोटर-





चुनावी चकल्ल्स-12 जनवरी-2010

जो जीता वही सिकंदर

धमकी देने व डराने का अलग ही आनंद है। राजनीति में तो डराकर धाक जमाने में तो और भी ज्यादा मजा आता है। हर चुनाव में 'बागीÓ मैदान में उतरते हैं। उन्हें डराया-धमकाया जाता है। चुनाव मत लड़ो। नहीं तो यह हो जाएगा, वो हो जाएगा। पार्टी से निकाल देंगे। पता नहीं क्या-क्या कहकर डराते रहते हैं। लेकिन चुनाव के बाद 'जो जीता वहीं सिकंदरÓ। मतलब साफ है बागी होकर जो जीता उसे कंधे पर बैठा लिया और जो हार गया वह नेताओं की ठोकरों में। ऐसी ही धमकियां पाली के नगरपरिषद चुनाव में भी दी गई थी। धमकी के बाद भी कई बागी पार्षद का चुनाव लड़े। कइयों को नोटिस भी दिए। तीन दिन में जबाव मांगा। लेकिन जब परिषद का चुनाव परिणाम आया तो धमकी वाले 'वे ही नेताजीÓ इन बागियों को दिया लिए ढूंढते फिर रहे थे और दूध-मलाई खिला रहे थे, कारण परिषद में स्पष्टï बहुमत नहीं मिला और उपसभापति की सीट चाहिए थी।

विधानसभा चुनाव का ही मामला लो। 'जैतारण वाले नेताजीÓ बागी होकर मैदान में उतर गए। पार्टी ने निकाल दिया। और चुनाव जीते तो सीधे 'लाल बत्तीÓ में सवार हो गए।

विधानसभा चुनाव में एक नेताजी भी बागी होकर मैदान में उतर गए थे। जब पाली में नगर परिषद के चुनाव आए तो सूरजपोल की एक सार्वजनिक सभा में वे ही नेताजी सीएम साहब की कुर्सी के नजदीक विराजमान थे। सीएम साहब ने तो उनकी तारीफ में कई कसीदें भी कसे। उस समय कईयों के चेहरे देखने लायक थे। नगर परिषद के पिछले बोर्ड में भष्टï्राचार पर बोलने के चक्कर में 'पंजाÓ के एक पार्षद को घर का रास्ता दिखा दिया। इस पार्षद को नवम्बर माह में हुए परिषद चुनाव में टिकट नहीं मिले इसके लिए एड़ी-चोटी तक का जोर लगा दिया। लेकिन हुआ क्या? पार्षद महोदय 'मुखियाजीÓ को ठेंगा दिखाते हुए पार्टी में तो शामिल हुए ही और टिकट लेकर जीत भी गए।

खैर...यह तो राजनीति है, यहां दागी-बागी-निष्कासित कोई खास मायने नहीं रखते। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है।

-वोटर-





चुनावी चकल्ल्स-11 जनवरी-2010

वाह रे नेताओं!

नेताओं का भी क्या कहना? टिकट की जंग और नामांकन के लिए न जाने कितने पापड़ बेले, नामांकन के लिए कई 'झूंठ के पुलिंदेÓ भी पेश कर दिए। अब इन नेताओं से कोई पूछे, झूंठ जब पकड़ा जाएगा तो कैसी किरकिरी होगी।

ताजा मामला ही लो। जिला परिषद व पंचायत समिति चुनाव का ढोल बजा हुआ है। जिसे इच्छा हुई उसने नामांकन दाखिल कर दिया। अब कई नामांकन खारिज भी हो गए। अब यह पूछोगे कि ये नामांकन खारिज क्यों हुए? इसकी तह में जाओगे तो नेताओं की बुद्धि पर तरस आएगा। कई नेताजी तो ऐसे निकले जिनकी कई-कई औलादें आंगन में खेल रही हैं। सभी को पता है, स्कूलों में दाखिले हैं, लेकिन फिर भी औलादों की संख्या को छुपा कर नेता बनने का सपना पाले हैं। औलादें चार-चार हैं, लेकिन बता दो ही रहे हैं। अब भला आप ही बताओ औलादें भी भला छुप सकती हैं। आप छुपा भी लो तो क्या आपका विपक्षी शांत बैठ जाएगा। ऐसे कई महानुभाव नेताजी औलादों की संख्या छुपाने के चक्कर में चुनावी दंगल से बाहर हो गए हैं। किरकिरी हुई वो अलग।

सुमेरपुर में तो गजब ही हो गया। एक नेताजी ने 'पंजाÓ से आवेदन कर दिया। उम्मीद थी कि 'पंजाÓ से टिकट मिल जाएगा, लेकिन यह क्या, जब सिम्बल जमा हुआ तो उन्हें 'पंजाÓ वालों ने तो पूछा नहीं बल्कि 'कमलÓ वाले बिन मांगे ही उनकी झोली में टिकट डाल गए। लेकिन यह टिकट भी उन्हें कोई फायदा नहीं पहुंचा सका। टिकट मिलने की खुशी नामांकन खारिज होते ही काफूर हो गई।

यह किस्सा तो और भी बड़ा निराला है। जिला परिषद में एक महिला नेता कुछ ज्यादा ही होशियार निकली। वैसे महिलाओं को उम्र छुपाने की आदत होती है, महिलाएं अपनी उम्र कम भले ही बता दें, लेकिन ज्यादा तो वे भूलकर भी नहीं बताती। लेकिन इस महिला नेता ने जानबूझकर यह भूल कर डाली। चुनाव लडऩे के चक्कर में इन्होंने अधिक उम्र लिख दी, जबकि इनकी उम्र 21 वर्ष (चुनाव लडऩे के योग्य) की भी नहीं है। स्कूल से जन्म प्रमाण पत्र आया तो सारा भांडा फूट गया।

खैर...अब ऐसे 'झूंठ के पुलिंदोंÓ का तो यही हश्र होना है। वैसे राजनीति में 'किरकिरीÓ कोई खास मायने नहीं रखती।

-वोटर-



चुनावी चकल्ल्स-9 जनवरी-2010

'पैनलÓ गायब

पैनल के खेल भी बड़े निराले हैं। पार्टियों ने अपने प्रभारी पंचायत समितियों में भेजे। कार्यकर्ताओं ने भी पैनल में नाम जुड़वाने का जुगाड़ किया। प्रभारियों ने भी दो से चार दावेदारों के नाम लिख डाले। पैनल में नाम आते ही कार्यकर्ताओं के चेहरे पर नूर आ गया, उन्हें लगा अब तो पैनल में से एक का तो नम्बर लगेगा ही। लेकिन जैसे ही पार्टी 'सिम्बल के पत्तेÓ खुले तो होश फाख्ता हो गए। चुनाव पर्यवेक्षकों ने पैनल को तो 'हवा- हवाईÓ बना डाला और ऐसे-ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दे दिया, जिन्हें पंचायत समिति प्रभारी भी नहीं जानते। खैर..यही तो राजनीति है।





'मुखिया जीÓ दरकिनार

'पंजाÓ के जिला मुखियाजी को टिकट के मामले में दरकिनार ही रखा गया। जुम्मा-जुम्मा दो माह पहले ही पाली शहर के नगरपरिषद चुनाव निपटे हैं। उस समय पार्षदों के टिकटों को लेकर जयपुर में जमावड़ा लगा था। जिला मुखियाजी की वहां भी कोई खास नहीं चली। कभी मुख्यमंत्री को पत्र लिखा तो कभी प्रदेश संगठन को। सारे पत्र रद्दी की टोकरी में चले गए। पर्यवेक्षकों को आरोपों के घेरे में लिया। अब यही हाल पंचायत चुनाव में हुआ है। पर्यवेक्षकों ने उन्हें खास तवज्जो नहीं दी। इस बार भी पर्यवेक्षकों को जमकर कोसा। लेने-देने तक का आरोप जड़ दिया। अब वे खुद ही इस्तीफे का मानस बना रहे हैं।



गटक गए हजारों की चाय

दो दिन तक पणिहारी बनी रही राजनीतिक अखाड़ा। इस अखाड़े से किसी को फायदा हुआ या नहीं, लेकिन होटल वालों के अच्छे वारे-न्यारे हो गए। पार्टी पदाधिकारियों ने तो अपने खर्चे से चाय नाश्ता किया ही, दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से आने वालों ने चाय की चुस्कियों के साथ की टिकट की चर्चा। इस चर्चा रूपी टाइम पास से दो दिन में कार्यकर्ता करीब छह हजार की चाय गटक गए। पर्यवेक्षकों से मिलने आने वाले कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों के पास गिलास में चाय कम ही थी, जिसकी जेब से पैसा जाना था उसने होटल वालों को संकेत दे दिया कि भैय्या, एक चाय को तीन चाय बनाकर लाएं। ताकि बिल कम आए। खैर...चाय की चुस्कियों के चलते सरकारी होटल की अच्छी-खासी आमदनी हो गई।

-वोटर-





चुनावी चकल्ल्स-8 जनवरी-2010

होटल से 'एलर्जीÓ

सरकारी होटल में राजनीतिक अखाड़ा। पर्यवेक्षकों का भी दिन भर रहा जमावड़ा। छुटभैय्या से लेकर आला नेता तक होटल में चाय की चुस्की के साथ राजनीतिक चर्चा में मशगूल। सांसद व जैतारण के लाल बत्ती वाले नेताजी भी होटल में ही टिकटों पर मशक्कत में जुटे हैं। यानी होटल कम पार्टी कार्यालय ज्यादा। लेकिन 'पंजाÓ के जिला मुखियाजी को यह होटल बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा । पर्यवेक्षक भी मुखियाजी से मिलने वीडी नगर वाले कार्यालय में आते हैं। जिला मुखियाजी से होटल से 'एलर्जीÓ का राज जाना। तो वे तपाक से बोल उठे, 'होटल का माहौल मेरे अनुकूल नहीं हैÓ। लेकिन रात गहराते ही माहौल अनुकूल हो गया और वे भी होटल में जा पहुंचे। अलग से कमरा ले लिया। शाम को होटल में आने का कारण जाना तो बोले, होटल में क्या 'राजनीतिक गुलÓ खिल रहा है यह भी जानना जरूरी है।



लाल बत्ती से नेताजी हुए 'लालÓ

- जैतारण के लाल बत्ती वाले नेताजी और 'पंजाÓ के जिला मुखियाजी में छत्तीस का आंकड़ा। यह 'आंकड़ाÓ आज से नहीं बल्कि बहुत पुराना और जगजाहिर भी है। लाल बत्ती वाले नेताजी गुुरुवार को सुमेरपुर रोड स्थित होटल में आए। उनकी गाड़ी पर लाल बत्ती लगी हुई थी। लाल बत्ती लगी गाड़ी की जानकारी मिलते ही जिला मुखियाजी को एक 'हथियारÓ मिल गया। उन्होंने कलक्टर से बात की और बोले, सरकार के नुमाइंदे खुले आम आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं। कुछ तो करो। सुना है कि जैतारण वाले नेताजी शुक्रवार को बिना लाल बत्ती की गाड़ी में ही होटल आए थे।



तर्र्कों की बौछार

इस समय बस एक ही चर्चा। टिकट मिले तो भरे पर्चा। भले चाहे हो कितना भी खर्चा। कार्यकर्ता से बात करो, तो वह खुद के टिकट मिलने के तर्र्कों की बौछारें कर देता है। एक कार्यकर्ता ने अपनी पीड़ा कुछ यूं जताई, बोला, इस बार काफी समय बाद सीट सामान्य हुई। सामान्य को टिकट नहीं मिला तो फिर पता नहीं कब नम्बर लगे। दूसरा कार्यकर्ता बोला, स्थानीय को टिकट दिया जाए। पांच साल तक तो पार्टी कार्यक्रमों में दरी-पट्ïटी उठाओ, नेताओं की सेवा में पिलते रहो, और जब चुनाव आए तो शूट-बूट वाले पैराशूटों को टिकट दे देते हैं, भला आप ही बताओ यह कहां का न्याय है।

-वोटर-





एक दिसम्बर-2009

इधर उधर की...नेताजी फुलफार्म में

नए बने 'शहर के नेताजीÓ इन दिनों पूरे फार्म में हैं। ताबडतोड़ शहर का दौरा कर डाला। शहर को चमाचम के आदेश दे दिए। अधिकारियों की क्लास लेने में लगे हैं। अवकाश के दिन भी अधिकारियों को चैन नहीं लेने दिया। 72 घंटे में 72 काम बता डाले। कई कामों पर हमारा ध्यान गया। इनमें से कई काम के लिए 'शहर के पुराने नेताजीÓ ने भी मुफ्त में वाहवाही लूटी थी। लेकि न पांच साल वैसे ही निकल गए। मोर्चरी का मामला हो चाहे पुरानी सब्जी मण्डी का, लाखोटिया उद्यान की बात हो या फिर इंदिरा उद्यान। ये सारे काम ऐसे हैं जो पिछले बोर्ड में पांच साल तक गूंजते रहे।



फजीहत का आनंद

भाजपा नेता गहरे सदमे में हैं। सदमा भी ऐसा कि सब कुछ देख रहे हैं, सुन रहे है, कुछ-कुछ पता भी है, लेकिन कर कुछ नहीं सकते। कारण, एक तो फायदा नहीं, दूसरा कोई पक्का सबूत नहीं। केवल मन मसोसकर रह जाते हैं। क्रॉस वोटिंग के बाद से मार्केट में भी अजीब-अजीब बातें आ रही है। कोई किसी पार्षद का नाम बता रहा है तो कोई किसी पर शक कर रहा है। बेचारी पार्षदजी भी किस-किसको सफाई देते फिरे। एक नेताजी ने तो अपना गुस्सा इस तरह जाहिर किया। बोले, हमारे उपसभापति चुनाव में तो हम 'फजीहतÓ कराने के लिए ही मैदान में उतरे थे। हमनें पूछा कैसे, वे बोले, कॉमन सी बात है। जब एक निर्दलीय तक अपनी तरफ नहीं कर सकते तो किस बात का चुनाव। और अब गुस्सा कर रहे हैं पार्षदों पर। जैसे पार्षदों की क्रॉस वोटिंग से ही हार हुई है।



साहब की मौजा ही मौजा

मेडिकल विभाग के जिला मुखियाजी की मौजा ही मौजा हो गई है। काफी समय से पाली की ट्विन सिटी में जाने के जुगाड़ में थे। अब बिना जुगाड़, बिना सिफारिश और बिना परेशानी की अपनी मनचाही जगह पर पहुंच गए। ट्ïिवन सिटी के मुखियाजी एपीओ हो गए तो अपने मुखियाजी की लॉटरी लग गई। इसे कहते हैं बिल्ली के भाग्य का छींका टूटना।



हर कोई सेटिंग में

'गुरुजीÓ इन दिनों सेटिंग में लगे हैं। अधिकारी लोग बेचारे गुरुजी का पाठशाला से जबरदस्ती मोहभंग कराने पर तुले हैं। लेकिन गुुरुजी है कि बच्चों से मोह नहीं छोड़ रहे। इस समय उनके पास एक ही काम है, बस जैसे-तैसे कर घर के पास के स्कूल में जुगाड़ हो जाए। कोई नेता के चक्कर लगा रहा है तो कोई अधिकारी की सिफारिश में लगा है। कई गुरुजी तो वाकई में तगड़े 'गुरुÓ हैं। एक गुरुजी तो ऐसे मिले, जिन्होंने पहले जुगाड़ किया कि शहर केआस-पास मेन रोड पर कोई स्कूल मिल जाए। फिर दुबारा जुगाड़ किया, शहर में ही स्कूल मिल जाए तो मजा आ जाएगा। यह भी जुगाड़ हो गया। लेकिन गुरुजी की इच्छा अभी तक भरी नहीं , अब वे इस जुगाड़ में है कि मोहल्ले का स्कूल मिल जाए तो क्या कहना।

-नगरवासी-



१९ नवम्बर--2009

- मन में डर, रहते हैं निडर

- चुनाव आयोग का डंडा। इस डंडे से प्रत्याशियों में अजीब डर। लेकिन सारे काम करते हैं पूरी तरह से निडर। एक प्रत्याशी के घर का नजारा। वहां देखा, पेम्फलेट का बंडल एक छोटे से कार्टून में पड़ा है। एक पेम्फलेट उठाया, उसे पढ़ा। उसकी सबसे नीचे लाइन पर हमारी नजर ठहर गई। उस पर लिखा था, प्रसार संख्या दो सौ। जबकि पेम्फलेट का बंडल ही करीब पांच हजार का दिख रहा था।



- सारी समस्याओं को मिटा दूंगा पर...

- एक चुनावी सभा का नजारा। मंच पर बिराजे हैं वार्र्डों के नेता। समस्याएं बताई गई। वार्ड नेता खड़ा हुआ, बोला अब तक इस वार्ड में कोई विकास नहीं हुआ। विपक्षी पार्टी को भी जमकर कोसा। इतने में एक वार्ड नेताजी खड़े हुए। लम्बी-चौड़ी विकास की घोषणाएं हांक डाली। बोले, बस एक वोट दे दीजिए, और फिर देखिए कैसे-कैसे विकास के काम कराता हूं। जोश-जोश में वे ऐसे-ऐसे काम भी बोल गए, जिनका नगरपरिषद से कोसो दूर तक वास्ता भी नहीं है। खैर...मतदाता भी नेताजी से ज्यादा ही होशियार हैं। पास खड़े एक पंडितजी (मतदाता) फुसफुसाए, लारली बार में ऐसा ही झांसा मिला था, इस बार भी मिल रहा है।

-वोटर





चुनावी चकल्ल्स- १७ नवम्बर-2009

जूते मार लेना

'वोटÓ के लिए युवा प्रत्याशी का जोश। ऐसे-ऐसे कर दिए वादे, जनता ने भी भांप लिए उनके इरादे। मंगलवार को थी सभा। युवा पार्षद प्रत्याशी ने बनाई अपनी हवा। भाषण पूरे जोश से बोले, जनता ने भी सुनी उसकी बात होले-होले। दो साल में वार्ड कर दूंगा चमन, नहीं कर पाया तो मुझे चौराहे पर लाकर सरेआम जूते मारकर इस्तीफा ले लेना।



मैैं भी'हेमामालिनीÓ

- चुनावी सभाओं का चल पड़ा जोर। सभाओं में कई ऐसे भी नेता आते हैं जो न विकास की बात करते हैं और न ही विरोधी को लपेटते हैं। बस जनता का अच्छा-खासा मनोरंजन कर डालते हैं। एक सभा में ऐसे ही नेताजी आ पधारे। बोले...भाजपा के पास हेमामालिनी हैं, लेकिन मैं भी हेमामालिनी से कम नहीं हूं। पूरी तरह हेमामालिनी का रोल निभा रहा हूं।



चुनाव निर्दलीय, झण्डा कांग्रेस का

- चुनाव प्रचार में कभी-कभी कई अजीब नजारे देखने को मिल जाते हैं। कांग्रेस के एक वर्तमान पार्षद की पत्नी को टिकट नहीं मिला तो उसने अपनी पत्नी को निर्दलीय प्रत्याशी बना दिया। उसके घर का नजारा देखा तो भौचक्के रह गए। पत्नी के हाथ में एक झण्डा था, इस झण्डे में एक चुनाव चिंह बना था, जबकि उसके घर की छत पर कांग्रेस का झण्डा लहरा रहा था।

-वोटर



चुनावी चकल्ल्स- १६ नवम्बर- -2009



...और सांसद बैरंग लौटे

-मतदाता को रिझाने और रूठे नेताओं को मनाना भी अजीब खेल है। 'चुनावÓ पांच साल का ऐसा 'मेलाÓ है जो चुनावी दंगल में कूदे नेताजी से सब कुछ करवा देता है। सोमवार को कांग्र्रेस के चुनाव कार्यालय में कार्यकर्ताओं था सम्मेलन। सांसद आए, मंच पर बिराजे। अचानक, सांसद सीट से खड़े हुए, पार्टी प्रत्याशी को बुलाया। कान में फुसफुसाया। सड़क की तरफ दौड़े। और प्रत्याशी की गाड़ी में बैठ कर चले गए। यह नजारा देख सारे कार्यकर्ता हक्के-बक्के रह गए। आखिर माजरा क्या है? जितने मुंह, उतनी बात। पता चला कि सांसद व पार्टी सभापति प्रत्याशी 'एक रूठे नेताÓ को मनाने उसके घर गए हैं, ये 'रूठे नेताÓ भी कांग्र्रेस से सभापति का टिकट चाहते थे, लेकिन टिकट नहीं मिला। आधे घंटे बाद सांसद और पार्टी प्रत्याशी वापस चुनाव कार्यालय आए, गाड़ी से उतरे तो वे बैरंग ही थे। 'रूठे नेताजीÓ उनके साथ नहीं थे। यह नजारा देख कई नेताओं के चेहरे खिल गए तो कईयों के चेहरे मुरझा गए।



- टिकट तो एक को ही मिलेगा

- सांसद मंच पर बैठे शहर के वर्तमान 'प्रथम नागरिकÓ को देख बोले, यह तो राजनीति है। यहां सब चलता है। टिकट तो एक को ही मिलेगा। यह कह वे मंच पर बैठ गए।

-'गुरुजीÓ! आप और यहां...

चुनावी महासमर का आनंद। इस आनंद रूपी सागर में डुबकी लगाने में साधु-संत भी पीछे नहीं , डुबकी लगाई और 'नेताÓ बन गए। तो भला गुरुजी क्यों पीछे रहे। नेता ना सही तो चुनाव का ही आनंद ले लें। 'गुरुजीÓ इन दिनों एक पार्टी के चुनाव कार्यालय में सुबह-शाम नजर आते हैं। कार्यालय में ऐसे जमकर बैठे रहते हैं जैसे पार्टी में लम्बे अर्से से सक्रिय कार्यकर्ता हों। ये गुरुजी किसी स्कूल के नहीं हैं बल्कि कॉलेज के हैं। बाकायदा सरकारी कारिन्दे भी हैं। खुले आम बैनर-झण्डी, पर्चियां, नेताओं की आवभगत मेंं जुटे रहते हैं। 'वर्किग डेÓ में भी चुनाव कार्यालय में नजर आ रहे हैं। लेकिन किसी की भी परवाह नहीं है। परवाह करें भी तो क्यों, आखिर राज्य में जिसकी 'सत्ताÓ है उसी ही पार्टी का प्रचार कर रहे हैं।



- वोट दो, मिठाई खाओ

एक 'मिष्ठान विके्रताÓ का चुनाव दंगल में कूदना मुसीबत बन गया। जितनी मिठाई दिन भर में बनाते हैं उसका कुछ हिस्सा तो कार्यकर्ता के मुंह में चला जाता है। जो भी चुनावी कार्यालय में आता है। चाय की चुस्की के संग मिठाई का ऑर्डर भी दे डालता है। लगे हाथ कोई नमकीन की भी फरमाइश कर डालता है। इन मिष्ठान विके्रता बनाम प्रत्याशी की मिठाई भी शहर में नहीं पूरे देश में प्रसिद्ध है। इसलिए हर कोई मिठाई के स्वाद से वंचित नहीं रहना चाहता। अब बेचारा प्रत्याशी मना भी नहीं कर सकता, आखिर उन्हें 'वोटÓ जो चाहिए।

- वोटर-







इधर-उधर की...

नो नबम्बर..-2009

टिकट या 'जंगÓ

टिकट के लिए पिछले दिनों जमकर 'जंगÓ हुई। 'जंगÓ भी ऐसी थी मानों टिकट नहीं मिला तो पता नहीं क्या-क्या कर देंगे। बड़े नेताओ पर ऐसे-ऐसे दबाव बनाए, कि बस पूछो मत। टिकट की चाहत में दिन का चैन और रात की नींद खराब की। 'कमलÓ से टिकट चाहने वालों की संख्या गजब की थी, एमएलए साहब ने कार्यकर्ताओं को ऐसी 'घुïट्टीÓ दी कि कई दावेदार चुपचाप वापस लौट गए और शांत हो गए। लेकिन 'पंजाÓ से टिकट की 'जंगÓ पाली में नहीं बल्कि राजधानी में 92 घंटे तक चली। इस 'जंगÓ में पार्टी के मुखिया और एक प्रमुख जनप्रतिनिधि में अच्छा खास वाक युद्ध भी हुआ और अंतिम पलों में अपने घरों को लौट आए।



साहब,हम तो हर तरफ हैं

'कमलÓ से सिम्बल लेने वाले कई दावेदारों ने नित रोज शक्ति प्रदर्शन किए। इन दावेदार के कई समर्थक तो ऐसे थे जो भी उनको बुलाता उसके साथ चल पड़ते। समर्थक बेचारे क्या करें। किसी का बुरा नहीं बनना चाहते। एक समर्थक तो कई दावेदारों के साथ शक्ति प्रदर्शन करने आदर्श नगर गए। आखिर में विधायक को पूछना ही पड़ गया, जनाब आखिर आप हो किधर, जनाब का जबाव भी लाजबाव था, हम तो उस तरफ है जिधर आप टिकट दोगे।



- फिर समय नहीं मिलेगा

- भाजपा में शहर के 'प्रथम नागरिकÓ बनने के टिकट को लेकर कोई खास घमासान नहीं मचा। जिसका टिकट फाइनल हुआ, उन्हें टिकट मिलने का पूरा कॉन्फिडेंस था। वे कई दिनों से महाराज व जैन धर्म के आस्था स्थलों के दर्शन करने में लगे रहे, कभी अहमदाबाद तो कभी जैतारण तो कभी कहीं। जब भी फोन करो एक ही जबाव मिलता फलां महाराज के पास हूं, प्रवचन में हूं। आखिर उन्होंने बता ही दिया कि टिकट मिलने के बाद दर्शनों के लिए समय नहीं मिलेगा, इसलिए यह काम पहले ही कर रहा हूं। वहीं कांग्रेस में टिकट लेने वाले राजधानी में जंग में लगे हुए थे।

अच्छा तो आप हैं....

पिछले दिनों 'शहर के नेताजीÓ की फैक्ट्री पर छापा पड़ा था। एक 'नेताÓ को शक है छापे की सूचना लीक हो गई। लीक का शक भी एक 'खाकीÓ वाले पर है। पिछले दिनों इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में शक करने वाले 'नेताÓ भी पधारे, और इसी कार्यक्रम में 'खाकीÓ वाले भी थे। 'नेताÓ भीड़ को चीरते हुए 'खाकीÓ वाले के पास पहुंचे। नेता ने खाकी वाले के गाल पर हाथ फेरा और बोले जनाब... तो आप हैं छापे की सूचना को लीक करने वाले। यह सुनते ही 'खाकी वाले साहबÓ के होश उड़ गए। वहां पास खड़े मीडियाकर्मी भी देखते रह गए।



सोने के पड़े लाले

- कांग्रेस कार्यालय में चुनाव पर्यवेक्षकों के जाने के बाद हॉल का ताला लग गया। रोजाना हॉल में बैठ कर हथाई करने वाले और दोपहर में 'कमरÓ सीधी करने वालों की हालत खराब हो गई। आखिर कमर कहां सीधी करें। यूं तो हॉल के बाहर कुर्सी पर बैठने की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन कुर्सी पर बैठ कर हथाई तो हो सकती है लेकिन कमर कैसे सीधी करें। -नगरवासी





इधर उधर की....-दो नवम्बर--2009

टिकट नहीं गाजर मूली

- निकाय चुनावों की हलचल तेज। फिलहाल टिकट की घमासान। हर दावेदार दिखा रहा आन-बान और शान। बता रहा, मैं ईमानदार बाकी सब.....। हालत यह है टिकट नहीं सब्जी मण्डी में गाजर-मूली मांग रहे हैं। दोनों ही दलों में टिकट के दावेदार का आंकड़ा हजार पार। कार्यकर्ताओं की रायशुमारी से टिकट का दावा करने वाली पार्टी में तो दावेदारों का आंकड़ा 'ट्रिपल सिक्सÓ तक पहुंचा। शहर के विधायक भी अचरज में। कह रहे हैं कि हमारी पार्टी में यह क्या हो गया। जो देखो टिकट मांगने को उतावला है।



- राजधानी में गाड़ी 'पिंचरÓ

- 'शहर के नेताजीÓ इन दिनों हैरान-परेशान। उम्मीद भी नहीं थी जिस गाड़ी को तेज दौड़ाने की बात कर रहे थे वह जयपुर में ऐसी 'पिंचरÓ होगी कि पाली 'बैरंगÓ ही लौटना पडेगा। नेताजी पूरे लवाजमे के साथ राजधानी पहुंचे। राज्य के मुखिया से मुलाकात पर मुलाकात भी की, लेकिन अगले दिन उल्टे पांव ही लौटना पड़ा। पब्लिक पूछती फिर रही है कि नेताजी 'खाकीÓ वाले कब हटेंगे।



यहां चार, वहां हजार

- निकाय चुनाव में शहर का 'प्रथम नागरिकÓ बनने की प्रतियोगिता हो रही है। 'कमलÓ में दावेदार गिने-चुने। सही ढंग से देखें तो कुल चार। इनमें से तीन ऐसे हैं जिन्हें पहले टिकट मिलनी की संभावना कम लगी, तो इन्होंने एका करा। किसी ने ब्राहणवाद की बात की, तो कोई ओबीसी कार्ड खेला, एक बेचारे कच्ची बस्ती के बाशिन्दों की दुहाई देते फिरे। तीनों ही मिलकर एक के लिए टिकट मांगा। लेकिन दाल नहीं गली। अब चारों मिलकर किसी एक को ही टिकट की बात कर रहे हैं। वहीं 'पंजाÓ दावेदार भी थोक में हैं। ये आवेदन भी एक पक्ष के हैं, दूसरे पक्ष के आवेदन तो और कहीं जमा हो रहे हैं। 'पंजाÓ में चल रहा घमासान टिकट वितरण करने वालों के गुलाबी सर्दी में 'पसीनाÓ छुडाएगा।



- दागी-बागी की बाते, बाबा आदम की बातें

'पंजाÓ चिंह वाली पार्टी ने पर्यवेक्षक नियुक्त किए। इन्हें निर्देश दिए कि पूर्व में रह चुके बागी को टिकट नहीं दिया जाए। कहा तो ऐसा गया कि जैसे मानों इस पर अमल हो जाएगा। शहर का इतिहास उठाया। तो मालूम चला कि एक बागी तो 'राजधानीÓ जाने के लिए दो बार से पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। हर बार न तो खुद जीतते हैं और ही अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को जीतने देते हैं। पार्टी से एक बार निष्कासित भी हो चुके है। अब वे ही पार्टी के जनप्रतिप्रनिधियों के साथ पार्टी के कार्यक्रमों में घूमते हैं और सभापति पद के दावेदार भी हैं। इतना सब कुछ है फिर भी पार्टी बात करती है दागी-बागी की। -नगरवासी





२६ अक्टूबर--2009

इधर उधर की

- आखिर क्या है राज

- दो दिन, दो राज। दोनों ही समझ से बाहर। मामला नगर परिषद का। परिषद में अचानक घटना घटी और कलक्टर ने किया पट्ïटों का रजिस्टर जब्त। परिषद कर्मचारी व अधिकारी सकते में, माजरा समझते इतने में एक और झटका। दूसरे दिन ही परिषद के मुखिया की पाली से रवानगी। मुखिया की विदाई कई लोगों को गले नहीं उतरी। ये आनन फानन में हुआ। मजेदार बात इधर लगी आचार संहिता और उधर मुखिया का चार्ज छीना। हम भी मामलों की तह में गए, मालूम चला कि मुख्यमंत्री कार्यालय से हो रहा है यह सब। सुनने में आया है कि 'पंजाÓ वालों के एक पक्ष की शिकायत पर ये घटनाएं हुई हैं।



- किधर हो जनाब

- परिषद के एक निर्दलीय पार्षद की स्थिति कुछ समझ से परे है। ये पार्षद पंजा के जुड़े किस गुट की तरफ हैं पता ही नहीं चलता। अभी कुछ दिन पहले परिषद नेताजी ने एक मुहिम चलाई। मुहिम के चलते एक पार्षद को पार्टी से निकलवाने के लिए 'पंजेÓ के पार्षदों से हस्ताक्षर करवाए। तब ये निर्दलीय पार्षद महोदय हस्ताक्षर करने को उतावले हो रहे थे, यहां तक इनका नाम हस्ताक्षर वाले पत्र में भी था। लेकिन अचानक उन्होंने पलटी खाई। निष्कासित पार्षद के परिषद परिसर में फर्जीवाडे के आरोप के एक मामले में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए , और प्रेस फोटोग्राफरों के सामने फोटो खिचवाने को उतावले हो रहे थे।



-पैरेलर पार्टी

- 'पंजाÓ में उठापटक। दो गुट आमने-सामने। दोनों ही गुट एक ही काम में लगे हैं। यानी इसे कहते हैं कि 'पंजाÓ में एक पेरेलर (समानांतर) पार्टी चल रही है। यह समानांतर पार्टी वाले बाकायदा पार्षदोंं से आवेदन ले रहे हैं। कार्यालय के गद्दों पर बैठकर आराम फरमा रहे हैं। परिषद के नेताजी पद के लिए आवेदन में भी पीछे नहीं।



- नूरा कुश्ती!-

-नूरा कुश्ती देखनी हो तो पंजे पार्टी के कार्यालय में आ जाओ। यहां पार्टी सिम्बल के लिए ऐसे आवेदन ले रहे हैं जैसे कोई कॉलेज में पढ़ाई के लिए प्रवेश चाहते है। नगरवासी भी पहुंच गए कार्यालय। पार्षद बनने का ख्बाव लेकर आए एक नेताजी ने अपनी पीड़ा आखिर बताई। बोले, ये आवेदन-फावेदन, पैनल सब फालतू की बातें हैं। पार्टी के ऊपर के लोगों से सेटिंग हो और कुछ जुगाड़ हो तो दो मिनट में ही टिकट हाथ में। वैसे भी आज तक आवेदन से कभी टिकट मिली भी है, यह सब नूरा कुश्ती ही है।

-नगरवासी-



६ नवम्बर-2009

कॉलम........इधर-उधर की... चिंता नहीं मजे कर

-हमारा पड़ोसी सुबह-सुबह आ धमका। सासें फूली हुई, हाथ में अखबार, माथे से पसीना पौंछने में व्यस्त। पड़ोसी की हालत देख एकबारगी तो हमारे होश उड़ गए। पास बैठाया, ठंडा पानी पिलाया। भाईसाहब क्या बात है? इतने परेशान क्यों हो? उन्होंने कहा अखबार पढ़ा क्या? मैंने कहा, ऐसा क्या छप गया जो बिना मुंह धोए ही चले आए। अखबार खोल बोले, देखो रेलवे ओवरब्रिज का सपना टूट गया। कितने दिनों से ख्वाब देख रहा था लूना को पुल पर चलाऊंगा। बंद फाटक से मुक्ति पाऊंगा। बिना रोक-टोक इधर उधर आऊंगा और जाऊंगा। उन्होंने एक ही सांस में बुने हुए सपनों का बखान कर डाला।

अब हमें बात समझने में देर नहीं लगी। चाय पिलाई और कहा, भाईसाहब पहले तो यह बताओ कि आपसे किसने सपना देखने को कहा था? अगर देख भी लिया तो ऐसा सपना देखा ही क्यों जो सिर्फ बातों से ही पूरा होना हो। यूं तो वैसे भी सपने टूटते ही हैं। सपना भला कभी अपना होता है। तो फिर बताओ इतना परेशान होने की क्या तुक?

हमारी बातें सुन वे तिमतिमाकर बोले, तो फिर क्यों दिखाया सपना। हमने कहा, सपने बातों से नहीं कुछ करने और जागरूकता से होते हैं पूरे। 'जागरूकÓ शब्द सुनकर तो वे ऐसे उछले जैसे हमने उन्हें थप्पड़ मार दिया हो, लाल-पीले होते हुए बोले, कहां हैं जागरूकता। जनता और उनके नुमाइंदे जागरूक होते तो भला आज सपना टूटता। दस दिन बाद ओवरब्रिज का काम शुरू हुए एक साल हो जाएगा। इस समय 'उद्ïघाटनÓ होना चाहिए था, जबकि एक पत्थर तक नहीं लगा है, जो थोड़ा बहुत सामान था वह भी ठेकेदार ले गया। कभी ये झंझट तो कभी वो लफड़ा। पैसे देने के नाम पर सभी जीरो, बातें बनाने में पूरे हीरो। मुफ्त में भला ओवरब्रिज बनता है क्या? पिछले 12 महीने से अधिकारियों की फिजूल की ही बातें सुनते-सुनते कान पक गए।

पडोसी के गुस्से को देखा। चिंता चिता के समान है। काम करो फल की इच्छा मत करो। हमने उन्हें गीता के दो-चार 'डॉयलॉगÓ सुना डाले। पडोसी एकदम चुप। काफी देर तक कुछ भी नहीं बोले। गजब, गीता प्रवचन में इतनी शक्ति। थोड़ी देर बाद वे खड़े हुए अखबार उठाया और जाते-जाते बोले, सच कहते हो भैय्या। कर्म कर फल की इच्छा मत कर। जनता के नुमाइंदों ने भी कर्म किया ही नहीं, अब वे भी 'फलÓ की इच्छा नहीं करें। चिंता तो वे करते ही नहीं है। वे चिंता करते तो हम यूं आपका समय खराब नहीं करते।

- नगरवासी-



इधर-उधर की... किधर है मेरा ठिकाना... २१ सितम्बर

-मोटरसाइकिल स्टार्ट कर चल दिए मंडिया रोड। चार कदम चले और गाड़ी रोकनी पड़ गई। पेट्रोल फुल था। न कोई रुकावट न कोई ब्रेकर। ट्रेफिक भी कम था। असल में सड़क पर गायों का झुण्ड था। यह देख मूड हो गया खराब। मन ही मन बड़बड़ाए। होंठ हिलते देख एक गाय रैंकी। और बोली, क्या बात है रे...। दिखता नहीं यहां हम बैठे हैं। निकलना है तो सड़क के बगल से निकल जाओ। हम तो ऐसे ही खड़े रहेंगे।

भोली सी सूरत के तीखे तेवर देख दंग रह गए। गुस्से को पी, गाय को किया प्रणाम। आप हमारी माता, कान्हा की चहेती, भगवानों का वास है। हमनें जमकर तारीफ की। झुण्ड से एक गाय बोली, वाह रे बच्चे...। डॉयलॉग बोलने में तो तगड़े माहिर हो। तुम्ही लोगों ने हमें 'आवाराÓ का तमगा दिया। डण्डा मारने से हिचकते नहींं। तस्करी कर कत्ल तक करवाने से चूकते नहीं। गर्म पानी या तेल से चमड़ी तक जला देते हो। दूध निकाल घर से भगा देते हो।

और...बातें करते हो इतनी लम्बी चौड़ी। हम बोले, नंदनी मांते! तुम्हारे लिए शहर में कांजी हाउस बनाया है। तो फिर सड़क पर 'आसराÓ क्यों बनाया है ? कांजी हाउस का नाम सुन एक गाय गुस्से से तमतमाई। जले पर नमक छिड़कने में तुम्हें शर्म नहीं आई। जरा बताना, आपके पाली शहर में कहां है कांजी हाउस? पहले गांधी पार्क को कांजी हाउस बनाया। पार्क विकास की बातें करते-करते वहां से भगाया। वहां कभी-कभार मिल जाता था ठिकाना। अब सड़कों के भरोसे है हमारा आशियाना। न पार्क विकसित हुआ और न दूसरी जगह कांजी हाउस बना। हमने कहा, परिषद वाले तो कहते हैं कि मंडिया रोड पर कांजी हाउस बनाएंगे। इतने में भूरी गाय बोल पड़ी, कांजी हाउस बनाएंगे, यह जुमला कब से सुन रहे हैं। बना तो नहीं ना। हमने फिर कहा, तुम्हारे कई चहेते पार्षद हैं। बोर्ड बैठकों में खूब सोचते-विचारते हैं..., कभी-कभी तो तुम्हारे लिए उलझ भी जाते हैं। देखो, कितने शुभचिंतक हैं बेचारे पार्षद।

झुण्ड में से एक बूढ़ी काली गाय बोली, भैय्या! लगता है, तुम बहस ज्यादा करते हो। क्या पार्षद पांच साल में भी कांजी हाउस खुलवा पाए। चुनाव फिर आने वाले हैं। शुभचिंतक और पैदा होंगे। लेकिन हमें तो इन सड़कों पर ही रहना है। गाली, दुत्कार, फटकार, गाडिय़ों की टक्कर नसीब में हैं। कांजी हाउस बन जाए तब आराम से सड़क से निकलना।

-नगरवासी-



१४ सितम्बर

कॉलम... इधर उधर की... लूट रहे भगवान-अब 'भगवानÓ माने जाने वाले भी लूटने लगे हैं। इसमें भला इतना चौंकने की क्या जरुरत? जब सब लूटने में लगे हैं तो ऐसे 'भगवानÓ भला क्यों पीछे रहें? ये बड़े माहिर हैं, यूं रास्ते में नहीं लूटते। घर बुलाकर बड़े प्रेम से लूटते हैं और लुटने वाला भी राजी-राजी लुट जाता है। मजाल की लुटने के बाद चंू तक कर जाए।

असल में क्या है हमारे यहां पर कईयों को कुछ ज्यादा ही दर्जा दे दिया है। 'गुरुÓ को तो गोविन्द से बड़ा मान लिया। तभी तो कहते हैं 'गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपणे गोविन्द दियो बतायÓ। और 'भगवानÓ का दर्जा डॉक्टर साहब ने ले लिया। अब कुछ कथित डॉक्टर रूपी 'भगवानÓ मरीज को घर बुला फीस के नाम पर दुगनी भेंट ले रहे हैं। बेचारा मरीज को तो पता ही नहीं होता कि असल में वह भेंट के नाम पर 'लुटÓ भी रहा है। सच पूछो तो लूटते-लूटते खुद 'भगवानÓ भी भूल चुके हैं कि वे कितना लूट रहे हैं। इसमें बेचारे भगवान का दर्जा लिए डॉक्टर साहब भी क्या करें? 'सुरसाÓ की तरह महंगाई ने अपना मुंह फाड़ रखा है, लेकिन मरीज को घर दिखाने का जो 'शुल्कÓ है वह 13 साल पुराना (11 सितम्बर 1996 में जारी शुल्क) है। अब भला आप ही बताओ कि 13 साल तक एक ही भेंट लेते रहेंगे? इतने वर्र्षों में क्या-क्या नहीं बदला ? डॉक्टर साहब का हुलिया, बंगला, कार, वेतन, बोनस, पत्नी के जेवर और पता नहीं नहीं क्या-क्या? लेकिन मरीज को घर पर भेंट लेने का शुल्क नहीं बदला। आखिर 'भगवानÓ भी कब तक सब्र करें? हद से गुजरने पर उन्हें मरीज को लूटने में भलाई समझी। अपने शहर में ही लो। सरकारी अस्पताल में बाकायदा घर पर दिन व रात में मरीज को देखने की सूची हैं, लेकिन वह ही अब धुंधली हो चली। जिस डॉक्टर को घर पर मरीज देखने के पच्चीस व तीस रुपए लेने होते हैं, वहीं खुलेआम दुगना ले लेता है। अब 'भगवानÓ से भला कौन बहस कर सकता है। अगर 'भगवानÓ रुष्टï हो गए तो...। -नगरवासी-
 
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