-राजेश दीक्षित
पाली। एक विकलांग न चल सकता है और न खड़ा हो सकता है, लेकिन उसके जज्बे को सलाम करना पड़ेगा, क्योंकि उसने लोकतंत्र के यज्ञ में वोट रूपी आहुति दी। उस 90 साल से अधिक उम्र की वृद्ध महिला को ही देखिए, शरीर जबाव दे चुका है। सारे दांत निकल चुके हैं। चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई हैं, सही ढंग से चल-फिर भी नहीं सकती लेकिन जब 'गांव की तकदीरÓ लिखने का वक्त आया तो उसने उम्र व शरीर को बाधा नहीं बनने दिया। परिजनों के सहयोग से वोट डालकर जता दिया कि वह भी अपने मताधिकार का उपयोग करने में पीछे नहीं है।
ये दो उदाहरण उन मतदाताओं के लिए सबक हैं जो मतदान के दिन घर की देहरी को नहीं लांघते और बाद में विकास नहीं होने पर अपने जनप्रतिनिधियों को कोसते रहते हैं।
इस समय पंचायतराज चुनाव हो रहे हैं। सरकार ने हमें इस समय 'गांव की तकदीरÓ लिखने वालों के चयन का मौका दिया है। यह अवसर पांच साल में केवल एक बार आता है। हमने यह मौका गंवा दिया तो हमारे पास केवल पछताने के सिवाय और कोई चारा नहीं होगा। आंकड़े गवाह हैं कि कम मतदान के कारण ही कई बार ऐसे जनप्रतिनिधि हमारे ऊपर पांच साल तक राज कर जाते हैं जिनके चयन में साठ-सत्तर फीसदी से अधिक मतदाताओं ने मोहर तक नहीं लगाई। लोकतंत्र ने मतदाता को वोट की आवाज दी है। उसे उसकी पहचान दी और जनप्रतिनिधि चुनने का पूरा हक दिया है, तो फिर वोट देने में आनाकानी क्यों? अपने मताधिकार का उपयोग नहीं करने में इतनी लापरवाही क्यों? गांव का विकास चाहते हैं तो फिर 'गांव की तकदीरÓ लिखने वालों के चयन में यह उदासीनता क्यों?
अब जब यह अवसर मिला तो हम चूक नहीं जाएं और हर हाल में, किसी भी परिस्थिति में मतदान करना ही है। इस लोकतंत्र के यज्ञ में मतदान की आहुति देने में लापरवाही करना यानी अपनी ही तकदीर लिखने वालों को मनमानी करने का अधिकार देना होगा। अब यह फैसला आपको ही करना है कि वोट देकर गांव के विकास में भागीदारी निभानी है या फिर उदासीन, लापरवाह बनकर अपने हाल में बैठना है। वोट नहीं देने पर पांच साल तक सिर्फ हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं रहेगा।
2014 cartoons
11 years ago
Seriously most appreciatable blog....no doubt..Through Adv. Pradhan Yogesh.
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